ख़्वाहिशों का ग़ुलाम



ग़ुलाम हो तुम अपनी ख़्वाहिशों के तुम्हें कैसे मै करू आज़ाद,
पिंजरे का दरवाज़ा तो खुला है मगर तुम उड़ना नहीं चाहते
तुम्हारी ख़्वाहिशों ने तुम्हारे पंख काट दिए हैं ।
ख़्वाहिशों के ग़ुलाम बन चुके हो तुम और तुम इस ग़ुलामी से आज़ाद होना नहीं चाहते ।
एक ख़्वाहिश पूरी होती है तो तुम दूसरी ख़्वाहिश बनाते हो
ख़्वाहिश तुम्हें मीठी बातों से बेवकूफ बनाती है, तुमसे अपना जाल बिछवाती है फिर खुद के बनाये जाल में तुम्हे ये फसाती है ।
मैं तुम्हें एक सलाह देता हूँ के अब तुम ये ख्वाहिश करो के तुम्हारी अब कोई ख्वाहिश ना हो ।
ये ख़्वाहिश तम्हारी ख़्वाहिश को नहीं तुम्हे पूरा कर देगी ।
तुम्हें आज़ाद कर देगी ।
तुम्हे आज़ाद होना है ख़्वाहिशों से तो ख़्वाहिश ही तुम्हे आज़ाद कर सकती हैं ।                                कशफ

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